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लखीमपुर में श्री श्याम कृष्ण कथा का भव्य समापन

 


बर्बरीक के शीश दान और श्याम स्वरूप की कथा से भावविभोर हुए श्रद्धालु, गौसेवा व पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश



राजेश राठी एवं ओमप्रकाश तिवाड़ी की संयुक्त रिपोर्ट


लखीमपुर, श्री कृष्ण गोपाल गौशाला, उत्तर लखीमपुर के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय श्री श्याम कृष्ण कथा का रविवार को यज्ञ की पूर्णाहुति एवं विधिवत पूजा-अर्चना के साथ समापन हुआ। कथा के अंतिम दो दिनों में व्यासपीठ से कथा वाचक महाराजश्री कन्हैया लाल जी पालीवाल ने भगवान श्रीकृष्ण, भक्त नरसी एवं वीर बर्बरीक की भक्ति, त्याग और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया।


महाराजश्री ने भक्त नरसी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान के प्रति अटूट विश्वास रखने वाले भक्त की भक्ति की लाज स्वयं भगवान रखते हैं। उन्होंने धर्म, सेवा, संस्कार एवं गौसेवा को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का संदेश दिया।



बर्बरीक के त्याग की कथा ने किया भावविभोर


कथा का प्रमुख आकर्षण वीर बर्बरीक के शीश दान का प्रसंग रहा। महाराजश्री ने बर्बरीक के जन्म, तपस्या, शौर्य और भगवान शिव की आराधना का वर्णन करते हुए उनके तीन अमोघ बाण प्राप्त करने की कथा सुनाई।


महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धारण कर बर्बरीक की परीक्षा ली। बर्बरीक द्वारा अपनी अद्भुत धनुर्विद्या का प्रदर्शन करने के बाद श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। भगवान की याचना सुनकर बर्बरीक ने बिना संकोच अपना शीश अर्पित कर दिया।


महाराजश्री ने बताया कि बर्बरीक के सर्वोच्च त्याग से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में वे ‘श्याम’ नाम से पूजे जाएंगे और ‘हारे के सहारे’ बनेंगे। इसी आस्था के कारण आज भक्त उन्हें खाटू श्याम बाबा के रूप में पूजते हैं।


उन्होंने कहा कि महाभारत युद्ध का साक्षी केवल बर्बरीक का शीश बना और इस प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि धर्म की विजय के पीछे अंततः परम शक्ति भगवान की ही होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को अहंकार से दूर रहने का संदेश देते हुए कहा कि भगवान और अहंकार एक साथ नहीं रह सकते।



श्रीकृष्ण के विभिन्न प्रसंगों का वर्णन


कथा के दौरान चीरहरण, गोवर्धन पर्वत धारण, कंस वध एवं धर्म की स्थापना, गोपी-उद्धव संवाद और रुक्मिणी विवाह सहित भगवान श्रीकृष्ण के अनेक प्रसंगों का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा, भजन एवं धार्मिक प्रसंगों से पूरा पंडाल भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।


महाराजश्री ने ‘जय आई असम’ का उद्घोष करते हुए असम की संस्कृति, परंपरा एवं असमिया वेशभूषा की भी सराहना की और लोगों से अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का आह्वान किया।



पर्यावरण संरक्षण का संदेश


कथा के दौरान पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए महाराजश्री ने श्रद्धालुओं से अपील की कि जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ अथवा अन्य शुभ अवसरों पर पौधारोपण करें और लगाए गए पौधे की नियमित देखभाल की जिम्मेदारी भी निभाएं। उन्होंने कहा कि केवल पौधा लगाना पर्याप्त नहीं, उसे वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखना ही वास्तविक पर्यावरण सेवा है।


उन्होंने मृत्यु, कर्म एवं मोक्ष के विषय पर भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया और भगवान की शरणागति को जीवन का सर्वोच्च मार्ग बताया।



गौसेवा के संकल्प के साथ हुआ समापन


कथा के अंतिम दिन गौशाला के लिए झोली कार्यक्रम आयोजित कर श्रद्धालुओं से गौसेवा में सहयोग का आह्वान किया गया। रविवार सुबह करीब 9 बजे महाराजश्री कन्हैया लाल जी पालीवाल श्री कृष्ण गोपाल गौशाला पहुंचे और गौभक्तों के साथ गौमाता का पूजन किया।


इसके बाद यज्ञ की पूर्णाहुति के साथ तीन दिवसीय श्री श्याम कृष्ण कथा का विधिवत समापन हुआ। श्रद्धालुओं ने गौसेवा, धर्म एवं सनातन संस्कृति के संरक्षण का संकल्प लिया तथा कथा वाचक महाराजश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

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